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मीडिया

झूमे बाला झूमे बाली

टेलीफ़िल्म

दूरदर्शन के नेशनल टेलीकास्ट के लिए बैसाखी पर एक रंगारंग कार्यक्रम बनाया अशोक जी ने। बैसाखी जो किसानों के उल्लास और उमंग का त्यौहार है। यों बैसाखी का ज़ोर दिल्ली, पंजाब और हिमाचल में अधिक देखने को मिलता है लेकिन फसल कटने के उल्लास से जुड़ा होने के कारण यह अलग-अलग नामों से पूरे देश में मनाया जाता है। बालियां झूमती हैं बालाएं झूमती हैं।

‘झूमे बाला झूमे बाली’ की शुरुआत जलियांवाला के शहीदों की याद से होती है। फ़िल्म के प्रारंभ में ढाई-तीन साल का एक बच्चा हाथ में तिरंगा लिए हुए पेड़ों के बीच से धीरे-धीरे (स्लोमोशन में) दौड़ता हुआ आता है। एक मोड़ पर वह जैसे ही पलटता है कि गोलियों की आवाज़ें उभरती हैं। बच्चा गिरने लगता है, तभी अशोक चक्रधर के दो हाथ उस बच्चे को थाम लेते हैं। दृश्य अत्यंत प्रभावशाली बन पड़ा है। बच्चे को गोदी में लिए हुए अशोक जी दर्शकों से संवाद करते हैं- ‘हां ऐसा हुआ था। हमें भूलना नहीं है, क्योंकि हम जानते हैं कि उन महापुरुषों ने अपने वक्षस्थल पर गोलियां झेलीं। किसलिए? इसलिए कि आगे आनेवाली पीढ़ियां आज़ादी की स्वच्छंद वायु में सांस ले सकें। उमंगित रह सकें और उल्लसित रह सकें । बच्चे के साथ अशोक जी तालवाद्यों की दमामा पार्टी की ओर बढ़ जाते हैं। अनेक प्रकार की झलकियों के बीच यह दमामा पार्टी बार-बार आती रहती है। ड्रम, तासे, घटम, मृदंगम, मंजीरे हर बार नई ताल और नई गत प्रस्तुत करते हैं। दृश्यांतरण में ‘आज बैसाखी है’ शीर्षक का गाना बार-बार नई हास्य स्थितियों में प्रकट होता है। बीच-बीच में बैसाखी की शुभकामनाएं देते हुए फ़िल्मी सितारे नज़र आते हैं।

कार्यक्रम का एक महत्त्वपूर्ण आकर्षण है- भीगा-भीगा कविसम्मेलन। यह एक अद्भुत प्रयोग है। कवियों का मंच पानी के अंदर बना हुआ है, जिसमें अशोक जी के साथ माणिक वर्मा, हुल्लड़ मुरादाबादी, श्याम ज्वालामुखी, डॉ. राकेश शरद, विश्वामित्र दाधीच और लोटा प्रसाद आदि कवि अर्ध जलमग्न बैठे हैं। इसी प्रकार श्रोता भी पानी में बैठे हैं। उनके आगे लाइफ़ ट्यूब की बनाई गई मेज़ों पर जलपान सजा हुआ है। तैरती हुई मेज़ों से खानपान का आनंद लेते हुए श्रोता काव्यरस पान भी करते हैं। फिर गूंजने लगता है एक गीत— ‘रे देखो खेतों में झूम रही बालियां…’ अलग-अलग प्रांतों के लोकनृत्यों के साथ हास्य झलकियों को बड़े क़रीने से पिरोया गया है।

तकनीकी दृष्टि से यह कार्यक्रम स्तरीय है। आउटडोर में मल्टीपल कैमरावर्क कम ही किया जाता था लेकिन अशोक जी ने इसे भव्य बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कार्यक्रम की निर्मात्री बागेश्री चक्रधर का कहना है कि जब भी हम ए.बी.सी. फ़िल्म्स के बैनर से कोई फ़िल्म बनाते हैं तो व्यय होने वाले धन पर अंकुश नहीं लगाते। कार्यक्रम की गुणवत्ता के लिए उदारता के सारे स्रोत खोल देते हैं। हमारी पूरी चेष्टा रही है कि ‘झूमे बाला झूमे बाली’ के माध्यम से राष्ट्रीय एकता का संदेश हमारे दर्शकों को मिले।