मीडिया

हाय-मुसद्दी

टेलीफ़िल्म

बड़ा परिवार दुखी परिवार के दृश्य सामने लाने वाली संगीत-प्रधान टेलीफ़िल्म है- ‘हाय मुसद्दी’। मुसद्दीलाल अशोक जी की कविताओं में आने वाला निम्नमध्यवर्गीय पात्र है। मुसद्दीलाल की सात संतानें हैं। पत्नी रामप्यारी ज़माने की मार सहते-सहते कर्कशा हो उठी है। ‘हाय मुसद्दी’ में अशोक चक्रधर ने अपने नाटक ‘सब कुछ मांगना लेकिन’ एवं ‘भोले-भाले’ की अपनी एक कविता ‘मुसद्दीलाल’ का इस्तेमाल किया है। दोनों रचनाओं को एक दूसरे में मिलाने के साथ-साथ नए गीतों की रचना की है। संगीत और कविता अशोक चक्रधर के पास दो ऐसे औज़ार हैं जिनसे वे शुष्क विषयों को भी छोटे-बड़े परदे के लिए रोचक बना देते हैं। घर की परेशानियों से तंग आकर मुसद्दीलाल एक दिन पलायन कर जाते हैं और स्वामी मुसद्दानंद के नाम से आश्रम खोल लेते हैं। इस फ़िल्म का कथानक ब्लैक ह्यूमर का अच्छा उदाहरण है।

इस फ़िल्म में अशोक जी ने अपने एक गीत को अपनी नाटकीय आवाज़ में गाया भी है। सिचुएशन ये है कि मुसद्दीलाल (हेमंत मिश्रा) घर की चिल्ल-पौं से परेशान होकर गांव छोड़ जाता है और उसे मिलता है एक साधु। साधु के हाथ में टेलीफ़ोन है और वह सीधे भगवान शिव शंकर को फ़ोन मिलाता है और मुसद्दीलाल की परेशानियों का निदान बताता है।

हास्य के माध्यम से परिवार कल्याण पर यों तो अनेक फ़िल्में बनी हैं लेकिन हास्य एवं लोक संगीत के माध्यम से बिना किसी को आहत करने वाली यह एक अनूठी फ़िल्म है। इस फ़िल्म का थ्री डी एनिमेशन का कार्य अनुराग चक्रधर ने किया है। संगीत डॉ. मुकेश गर्ग का तथा छायांकन शामू बर्मन का है।