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गुलाबड़ी

टेलीफ़िल्म

गुलाबड़ी न तो खद्दर के कपड़े पहनती है, न उसने कंधे पर झोला ही लटका रखा है, न कभी पाठशाला का मुंह उसने देखा है। किसी बड़े शहर की क्रांतिकारी संस्थाओं से भी उसका कोर्ई संपर्क नहीं। राजस्थान के एक छोटे से कस्बे की वासिनी है गुलाबड़ी। जन्म से कुम्हारन, लेकिन ‘नारी-मुक्ति’ पर कई पाठ पढ़ा सकता है यह गंवई चरित्र।

अशोक चक्रधर की टेलीफ़िल्म ‘गुलाबड़ी’ करीब दो घंटे इसी नारी के आस-पास घूमती है। एक ऐसे संसार की रचना करती है, जिसमें नारी को चारों ओर से शोषण-उत्पीड़न के अलावा कु छ नहीं मिलता। पर गुलाबड़ी एक ऐसा सशक्त चरित्र है, जो कभी हार नहीं मानता। कुछ वर्ष पूर्व अशोक चक्रधर ने एक रेलयात्रा के दौरान ‘हंस’ में राजस्थान के सुप्रसिद्घ कथाकार यादवेंद्र शर्मा ‘चंद्र’ की कहानी ‘लुगाई जात’ पढ़ी। इस कथा का कें द्रीय चरित्र ‘गुलाबड़ी’ उनके मन पर छा गया और वह इसे एक फ़िल्म का रूप देने के लिए योजना बनाने लगे।

कथा को विस्तार और पटकथा का रूप देकर और ज़मीन से जुड़ी भाषा के शब्दों को पिरोकर १९८९ में जो प्रस्ताव उन्होंने दूरदर्शन को दिया तो १९९४ में जाकर यह स्वीकार हुआ। फि र अशोक चक्रधर राजस्थान के चुरू में इसकी शूटिंग में जुट गए। ‘गुलाबड़ी’ कैमरे की आंख से लिखी उनकी एक सशक्त कविता है।

‘गुलाबड़ी’ एक स्वाभिमानी राजस्थानी धाय मां की कहानी है। वह एक संपूर्ण नारी है, जिसे अपने कु म्हार होने पर, मां होने पर और नारी होने पर गर्व है। कहानी शुरू होती है सेठ पुत्र बिरजू और उसकी नई-नवेली दुल्हन के कलकत्ता से वापस अपने गांव आने के दृश्य से। वहां उनकी मुलाक़ ात होती है वृद्घ सेठ गौड़हरि और झनकू काका से। अतीत के पन्ने पलटते जाते हैं। बिरजू की पैदाइश मां-पिता की प्रौढ़ावस्था में हुई। सेठानी के आंचल से दूध न उतरा। बच्चे के जीवन को बचाने के लिए पड़ोस की कु म्हारन को बुलवाया गया, जिसका पति सख़्त बीमार था और घर में तंगी था। उसका ख़्ाुद का बच्चा चार महीने का था। तीनों के जीवन को बचाने के लिए गुलाबड़ी ‘धाय मां’ बन गई। बिरजू को तो जीवन मिल गया, पर न तो गुलाबड़ी का पति बच सका और न ही बच्चा। सेठ रामरतन ने उसे मान-सम्मान के साथ धाय मां की पदवी दी और घरभर की चाबियां सौंप दीं। बदले में वह भी स्नेह और ममत्व हर बड़े-छोटे पर लुटाती रही, साथ ही हाड़-तोड़ मेहनत भी करती रही। आखिऱ, वह सबकी ‘धाय-मां’ जो थी। वैसे इस सम्मान के पीछे छिपे स्वार्थ को भी वह खूब समझती थी, पर वह भी कम स्वाभिमानी नहीं थी। अपने पर कसे गए ताने का गुस्सा सेठानी को चाबी का गुच्छा थमाकर, रूठकर निकालती थी।

गांव के अनेक नौजवानों ने उससे प्रेम-निवेदन किया, वह उन्हें मुंह-तोड़ जवाब देती। एक रात सेठ के बेटे ने उसका हाथ थामा तो उसने थप्पड़ जमाते हुए उसे दुत्कारा, ‘अंधेरे में गुलाब नज़र आ रहा है, उसके कांटे नहीं, धाय-मां कहते हो तो उसका मान भी रखो।’ बाद में उसी विष्णु पर विपत्ति पड़ने पर वो काम भी आती है।

गुलाबड़ी अपने सुख-दुःख, अपमान को बांटती है- अपने संगी तालाब के साथ। अशोक चक्रधर ने तालाब को एक चरित्र की तरह फ़िल्माया है। यह तालाब सिर्फ़ तालाब नहीं है- गुलाबड़ी का एक मित्र, एक सहचर बनकर उभरता है। सेठ रामरतन के मित्र सेठ गौड़हरि ‘गुलाबड़ी’ से प्रेम करने लगते हैं। पर गुलाबड़ी उनसे स्पष्ट कहती है- ‘नाता करो, बिंदी चमकाओ मेरे माथे पर। रखैल बनकर रहना मंजूर नहीं।’

जब उसका देवर आखाराम पत्नी की मृत्यु के बाद गुलाबड़ी से नाता करने को कहता है तो गुलाबड़ी का सोया नारीपन हिलोर लेने लगता है। वह नाता करना चाहती है, पर सेठ के घर में मानो भूकंप आ जाता है। इतनी अच्छी नौकरानी जो उनके हाथ से निकल रही है। ‘धाय-मां’ का मान-सम्मान ताक पर रखकर सबके सब उस पर झल्ला उठते हैं। पर गुलाबड़ी हिमालय की तरह अटल रहती है।

दो घंटे इस टेलीफ़िल्म में एक संपूर्ण फ़ीचर फ़िल्म के पूरे तत्व मौजूद हैं।

इस फ़िल्म के गीतकार भी अशोक चक्रधर हैं। शास्त्रीय रागों और लोकगीतों पर आधारित इसके गीत हृदय को उद्वेलित करते हैं। इसका संगीत पक्ष सशक्त है। उमा गर्ग, रीता गांगुली आदि ने कसक के साथ गाया है— रेत के धोरों की लय है- मुकेश गर्ग के संगीत में। पूरी फ़िल्म का एक-एक फ्रेम तन्मयता से संजोया गया है। शामू बर्मा ने हेवलियों के सौंदर्य और गुलाबड़ी की गरिमा को ख़ूबसूरती से छायांकित किया है।

इस फ़िल्म की एक और बड़ी उपलब्धि है गुलाबड़ी का चरित्र जीनेवाली अभिनेत्री सोनाली कुलकर्णी। सोनाली ने गुलाबड़ी के चरित्र को संपूर्णता से जिया है। सोनाली के अभिनय में जो नैसर्गिक सुंदरता है, वह एक-एक भाव में स्पष्ट नज़र आती है। चाहे बच्चों की तरह खिलखिलाना हो या चाक पर बर्तन बनाना हो। सोनाली ने जिस ‘डिग्निटी’ और ‘ग्रेस’ से गुलाबड़ी को जीवंत किया है, वह अद्भुत है। अशोक चक्रधर की इस सशक्त टीम के अधिकांश कलाकार थियेटर से जुड़े हुए हैं। हेमंत मिश्र, अमिता उद्गाता, राजेश तैलंग, अरुण शर्मा, सुभाष त्यागी, रमेश खन्ना ने राजस्थान की आत्मा को पकड़ने का पूरा प्रयत्न किया है।

(साभार, अमर उजाला, २८ दिसंबर, १९९४)