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पंगु गिरि लंघे

वृतचित्र / लेखन-निर्देशन

फ़िल्म के प्रति अशोक चक्रधर की दीवानगी का परिणाम है ‘पंगु गिरि लंघै’ नामक वृत्तचित्र! यों तो यह वृत्तचित्र मात्र १४ मिनिट का है लेकिन 35 एम. एम. में रंगीन कोडक फ़िल्म पर बनाया गया है। बनाने के लिए उन्होंने कुछ तो कविसम्मेलनों से प्राप्त धन लगाया, कुछ बैंक से लोन के रूप में मिला। 1983 में इसकी लागत लगभग एक लाख रुपए आई। जिसमें 20 हजार रुपए बैंक का ब्याज भी सम्मिलित है। बिना किसी ख़रीद-आश्वासन अथवा अप्रूवल के एक विश्वविद्यालय अध्यापक के लिए यह एक जोखिम भरा काम था, पर लगन की अगन के कारण उन्होंने श्री दुलाल साइकिया के सहयोग से यह फ़िल्म बना डाली। विषय का महत्व और उनका उत्साह देखकर राजश्री प्रोडक्शन, बंबई के राजबाबू ने फ़िल्म सम्पादन के लिए अपनी पुरानी मोवियाला मशीन लगभग एक महीने के लिए मुफ्त में प्रदान की। अशोक चक्रधर मानते हैं कि इस फ़िल्म के निर्माण ने उन्हें सिनेमा के लगभग हर पहलू का व्यावहारिक ज्ञान दिया। सैद्धांतिक ज्ञान उसी दौरान उन्होंने श्री मिकी पटेल और सईद मिर्ज़ा द्वारा दी गई पुस्तकों से प्राप्त किया। फ़िल्म को अंततः फ़िल्म्स डिवीज़न ने ख़रीद लिया। इसका पहला प्रदर्शन दिल्ली में रीगल सिनेमा के मालिक श्री सिद्धेश्वर दयाल ने निःशुल्क कराया। प्रथम प्रदर्शन के बाद १९८३ में ही दिनमान में डॉ. प्रेम जनमेजय की एक टिप्पणी प्रकाशित हुई थी-

‘आम दर्शक का निष्कर्ष यह है कि वृत्तचित्र नीरस, उबाऊ, आंकड़ेबाज़, सरकारी ढोल पीटनेवाले तथा फ़िजूल होते हैं। ‘पंगु गिरि लंघै’ पढ़ते ही लगा था कि फ़िल्म भक्तिभाव से भरपूर होगी। जब रीगल के दरवाज़े पर महिलाओं को हाल में जाने की प्रतीक्षा में बतियाते देखा तो विश्वास हो गया। जिसकी कृपा से गूंगा बोलने लगता है, अंधा देखने लगता है, बहरा सुनने लगता है और लंगड़ा पहाड़ पर चढ़ने लगता है, ऐसे ईश्वरीय चमत्कारों पर अपनी कभी भी आस्था नहीं रही है। अप्पन मज़ाक के मूड में बैठे थे।

परंतु ‘पंगु गिरि लंघै’ ने सोचने का तरीका ही बदल दिया। ईश्वर पर तो नहीं मनुष्य की शक्ति पर आस्था बढ़ गयी। अशोक चक्रधर और दुलाल साइकिया द्वारा ‘गतिचित्रम्‌’ के बैनर के अंतर्गत बने इस वृत्तचित्र में एक नए कोण और भिन्न तरीके से चीज़ों को देखा गया है। आदमी आदमी का भाग्य बदल सकता है। ऐसे अपंग, बैसाखियां जिनकी ज़िंदगी ढो रही थीं, उन्हें अपने पैरों पर अपने सहारे खड़ा करने का अद्भुत कार्य किया है सवाई मानसिंह अस्पताल, जयपुर के अनुसंधान एवं पुनर्वास के द्र ने। डॉ. पी.के. सेठी, डॉ. कासलीवाल तथा शिल्पकार मास्टर जी की अथक कल्पना और प्रयत्नों ने अपंगों को बैसाखियों के सहारे नहीं ‘कृत्रिम परंतु प्राकृतिक’ पैर की तरह गतिवान अपने धरातल पर खड़े होने की शक्ति दी है। उन्होंने इस देश की ज़रूरतों के अनुसार कृत्रिम पैर बनाए हैं, इस पैर को लगाकर चलना, दौड़ना, उकडूं बैठना, पालथी मारना, चढ़ना, कू दना, तैरना सब संभव है। अब तक हम पश्चिमी देशों के अनुरूप बनाए गये पैरों पर मात्र खड़े थे। अब हम अपने अनुसार बनाए गये पैरों के द्वारा अपनी धरती पर उठ-बैठ, खा-पी सकते हैं।

अशोक चक्रधर और दुलाल साइकिया ने इस वृत्तचित्र में मात्र कृत्रिम पैर बनाने के कारख़ाने, आंकड़ों, डाक्टर और शिल्पकार से साक्षात्कार को ही कैमरे में क़ैद नहीं किया है, अपितु असंख्य रोगियों के चेहरों पर तैरती मानवीय संवदेनाओं को सेल्यूलाइड पर उतार दिया है। वर्षों से जो लोग दूसरों पर बोझ बने थे, वही अब रिक्शा चलाकर दूसरों को ढो रहे हैं। उनके चेहरे पर श्रम और आत्मविश्वास की आयी चमक को अशोक और दुलाल ने दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया है। कृत्रिम पैर लगाये एक बच्ची जब हिचकती झूले की ओर बढ़ती है, पांव झूले पर रखती है, धीरे-धीरे झूले की पेंग बढ़ाने के साथ उसके चेहरे का आत्मविश्वास और मुस्कान बढ़ जाती है, तब दर्शक सम्मोहित हो उठता है, फ़िल्म समाप्त हो जाती है। पंद्रह मिनट कहां गए पता नहीं चलता। सामाजिक उद्देश्य और मानवीय मूल्यों को स्थापित करनेवाला यह वृत्तचित्र अपनी बात रोचक ढंग से कह देता है। इसमें शिब्बू के छायांकन और पं. शिवप्रसाद के संगीत का विशेष योगदान है। संपादन ने फ़िल्म को तीव्रता दी है और अनावश्यक विस्तार से बचाया है।

फ़िल्म समाप्त होने से अशोक चक्रधर संतुष्ट नज़र आ रहे थे। परंतु जब मैंने पूछा कि फ़ाइनैंस की क्या और कैसे व्यवस्था थी, तो उनकी संतुष्टि ग़ायब हो गयी। बोले, ‘भई अभी तो गांठ का पैसा लगा दिया है। कुछ युनाइटेड बैंक से कर्ज़ लिया है, कुछ दोस्तों की जेब हल्की की है। अस्सी हज़ार रुपए इस प्रोजैक्ट में लग गए। अब देखो अगर फ़िल्म डिवीज़न वाले ख़रीद लें तो बात बने।

‘फ़िल्म बनाने के कीटाणु तो बहुत देर से कु लबुला रहे थे। बहुत पहले अपनी कविता ‘बूढ़े बच्चे’ पर फ़िल्म बनाने की सोची थी। मैं केवल सूचनात्मक उबाऊ फ़िल्म नहीं बनाना चाहता था, सामाजिक उद्देश्य और मानवीय संवेदना के साथ जोड़ना चाहता था। बस कूद पड़ा मैदान में। मार्च’ 83 के अंत में आइडिया बना और अप्रैल में चार दिन में हमने शूटिंग कर डाली। मई से लेकर अगस्त तक के चार महीनों ने फ़िल्म निर्माण की कई खिड़कियां मेरे सामने खोलीं। रिफ्लेक्टर उठाने से लेकर निर्देशन तक का अनुभव प्राप्त किया।’
(साभार, दिनमान, 1983, प्रेम जनमेजय की समीक्षा के कुछ अंश