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गोरा हट जा

वृतचित्र / लेखन-निर्देशन

‘गोरा हट जा’ 16 एम.एम. में बना हुआ 60 मिनिट का एक वृत्तचित्र है। सन्‌ 1985 कांग्रेस का जन्म-शताब्दी वर्ष था। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी ने देशभर में ज़ोर-शोर से उत्सवधर्मी वातावरण बनाया। स्वाधीनता-संघर्ष की स्मृति में नए सिरे से चिंतन करने की शुरुआत करती है यह फ़िल्म। अशोक चक्रधर बताते हैं कि कविसम्मेलन मंच पर उनकी साथी कवयित्री श्रीमती प्रभा ठाकुर राजस्थान में जन्म शताब्दी समारोह समिति के फ़िल्म-निर्माण पक्ष की देखभाल कर रही थीं। वे अशोक जी की फ़िल्म ‘पंगु गिरि लंघै’ से प्रभावित थीं। उन्होंने अशोक जी पर इस फ़िल्म के लेखन और निर्देशन की ज़िम्मेदारी सौंप दी। उसके बाद तो अशोक जी शोधकार्य में जुट गए। बीकानेर के संग्राहालय और अनेक इतिहास-पुस्तकों से उन्होंने अपेक्षित जानकारी हासिल की और उन्हें यह जानकर घनघोर आश्चर्य हुआ कि स्वाधीनता-संघर्ष में राजस्थान के सेनानियों को समुचित आदर-मान नहीं मिला। गोविन्द गुरु, के सरीसिंह बारहट, सीताराम पथिक, अर्जुनलाल सेठी, रामनारायण चौधरी, सागरमल गोपा जैसे अनेक स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्हें देश पता नहीं कै से भूल गया। बीजोलियां का नरसंहार किन्हीं भी अर्थों में जलियांवाला बाग़ से कम नहीं था। पर राजस्थान में एक विडंबना यह रही कि वहां रजवाड़ों का बोलबाला था। राजस्थान की जनता जहां एक ओर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के शिकंजे में जकड़ी हुई थी, वहीं दूसरी ओर देसी राजे-रजवाड़े भी उसका शोषण करते थे। अशोक जी राजस्थान में स्थान-स्थान पर घूमे, बुज़ुर्ग व पुराने स्वतंत्रता सेनानियों से व्यक्तिगत रूप में मिले। अपने अध्ययन से उत्साहित होकर उन्होंने निर्णय लिया कि रूखे-सूखे वृत्तचित्र के स्थान पर वे एक रोचक डॉक्यू-ड्रामा बनाएंगे। आर्थिक सीमाएं थीं फिर भी उन्होंने इसे अधिकतम लोगों का सहयोग प्राप्त करके श्रमपूर्वक एक श्रेष्ठ फ़िल्म के रूप में प्रस्तुत किया।

राजस्थान की पड़-गायन शैली से फ्लैशबैक पद्घति का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने राजस्थान की गौरवगाथाओं को बताने के लिए कहीं चित्रों के माध्यम से, कहीं राजस्थान के भव्य क़िलों के माध्यम से, कहीं घटनाओं की पुनर्प्रस्तुति के माध्यम से और कहीं फि क्शन का सहारा लेते हुए फ़िल्म का निर्माण किया है। कॉमैण्ट्री इतनी प्रभावशाली और मर्मस्पर्शी है कि छः रील की यह फ़िल्म किसी कथा-फ़िल्म जैसी लगती हैं। इस फ़िल्म के बाद ही दूरदर्शन पर इस तरह की फ़िल्मों का सिलसिला शुरू हो गया। श्री श्याम बैनेगल ने ‘भारत एक खोज’ इसके बाद बनाई। जब कभी फ़िल्म का इतिहास लिखा जाएगा तब अशोक जी को यह सिलसिला शुरू करने का श्रेय अवश्य दिया जाएगा।

छायांकनकार मोहन हरि, सह- निर्देशक आशकरण अटल और पुरुषोत्तम प्रतीक, कला-निर्देशक सुरेन्द्र राजन के अतिरिक्त श्रीमती प्रभा ठाकु र की निर्माण-प्रबंधन टीम ने अत्यंत श्रम से ‘गोरा हट जा’ को एक अविस्मरणीय फ़िल्म बना दिया। फ़िल्म के सशक्त होने के पीछे लक्ष्मीनारायण गर्ग के संगीत ने अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। राजस्थान की लोकधुनें एकाग्रता बनाए रखने में मददगार साबित होती हैं।