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ढाई आखर

धारावाहिक / लेखन-निर्देशन

साक्षरता मिशन को सफल बनाने की ज़िम्मेदारी किसी एक वर्ग-विशेष की नहीं है, बल्कि पूरे शिक्षित समाज को इसमें अपनी भागीदारी निभानी पड़ेगी। ‘ढाई आखर’ धारावाहिक के माध्यम से इस बात को बताने का प्रयास किया गया है लेखक-निर्देशक अशोक चक्रधर ने।

धारावाहिक ‘ढाई आखर’ की शुरुआत अलग-अलग जगह से ‘अनुदेशक’ की टे्रनिंग लेने आए युवक-युवतियों को उनकी टे्रनिंग की समाप्ति पर, ट्रेनिंग संचालक द्वारा दिए जा रहे समापन-भाषण से होती है। धारावाहिक के दो मुख्य चरित्र, एक ही गांव के निवासी सरला (माला कुमार) और चंदर (राजेश तैलंग) भी इन प्रशिक्षार्थियों में शामिल हैं। अभिभाषण की समाप्ति के बाद ‘सरला’ और ‘चंदर’ जैसे ही ‘सेंटर’ के बाहर निकलते हैं, उनकी भेंट दो ऐंद्रजालिक चरित्रों नट (अरुण बाली) तथा नटनी (विनीता मलिक) से होती है। आगे चलकर ये दोनों चरित्र, सरला और चंदर के गांव पहुंचने पर, उनके साक्षरता-मिशन को सफ ल बनाने में मदद करते हैं।

‘प्रौढ़ शिक्षा’ जैसे नीरस विषय पर भी मनोरंजक ढंग से कार्यक्रम तैयार किया जा सकता है, धारावाहिक ‘ढाई आखर’ इस बात का सशक्त उदाहरण है। पच्चीस-पच्चीस मिनट की पांच कड़ियों वाले इस धारावाहिक में लोकरुचि-संपन्न गीत-संगीत ने सबसे अहम भूमिका निभाई है। ‘ढाई आखर’ के पांच भागों की धुनों को सरदार गुरशरण सिंह जिम्मी ‘विर्क’ तथा स्वयं अशोक चक्रधर ने तैयार किया है।

‘प्रिया’ और ‘आस्था’ नाम की स्वैच्छिक संस्थाओं के सहयोग से ए बी सी फ़िल्म्स ने इस धारावाहिक का निर्माण किया है। अरुण बाली, विनीता मलिक, माला कुमार तथा राजेश तैलंग के अलावा शैल चतुर्वेदी, अनिल चौधरी और कैलाश नागर की भी इस धारावाहिक में महत्त्वपूर्ण भूमिका है। सीधे-सीधे ढंग से अपनी बात कहने और मनोरंजक प्रस्तुति के कारण ‘ढाई आखर’ से साक्षरता मिशन को अवश्य ही मदद मिलेगी।
(साभार, नवभारत टाइम्स, नई दिल्ली, २२ फ़रवरी, १९९०)

टिप्पणी : ‘ढाई आखर’ की पांच कड़ियों को पुनर्संपादित करके दो टेलीफ़िल्म्स के रूप में भी तैयार किया गया जिसे दूरदर्शन ने अनेक बार दिखाया। ‘इग्नू’ के ज्ञान चैनल पर आज भी इस धारावाहिक का प्रयोग होता है।