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बोल बसंतो

धारावाहिक / लेखन-निर्देशन

‘बोल बसंतो’ क़ानूनी साक्षरता के उद्देश्य से बनाया गया दस भागों में विभक्त एक फ़िल्म धारावाहिक है। जिसे फोर्ड फाउंडेशन के वित्तीय सहयोग से ‘मार्ग’ नामक स्वैछिक संस्था ने प्रायोजित किया। यह धारावाहिक हमारे जीवन में आए-दिन उभरते सामाजिक क़ानूनी मसलों को जानने-समझने का एक प्रयास है।

बसंतो एक समझदार और ख़ुद्दार औरत है। गली-गली घूमकर पुराने कपड़ों के बदले में बर्तन बेचती है। देश की आम औरतों की तरह क़ानूनों से अनजान है। वकील सत्यव्रत के सम्पर्क में आने के बाद उसकी क़ानूनी जानकारी बढ़ने लगती है। उसके सोचने समझने में बदलाव आता है। अपनी नई समझदारी का वह जीवन में कैसे इस्तेमाल करती है, अपने आसपास होती दहेज, बलात्कार, पुलिस अत्याचार आदि समस्याओं से कैसे टक्कर लेती है, यही इस धारावाहिक की विकास-यात्रा है।

सत्यव्रत समाजसेवा की भावना से प्रेरित एक सहृदय वकील हैं। वे समाज में क़ानूनों के प्रति जागरूकता लाना चाहते हैं। विशेष रूप से औरतों में, क्योंकि हमारे समाज में क़ानूनों की जानकारियां न होने के कारण औरतों का ही शोषण अधिक होता है। बसंतो को उन्होंने इस योग्य बनाया कि वह क़ानूनी समझदारी का उपयोग करते हुए सामाजिक मसलों से अकेले निपट सके। मौक़ा पड़ने पर महिलाओं के पक्ष में एक संगठित लड़ाई लड़ सके।

लाजो की ज़िंदगी बहुत मुश्किल हालातों से गुज़री। वह समय और समस्याओं से निरंतर जूझती रही। बसंतो और सत्यव्रत की मदद से उसने स्वयं को सशक्त बनाया। पागल पति से तलाक लिया, संपत्ति में अपना अधिकार पाया। अन्य औरतों के श्रम-संबंधी मसलों को लेकर लड़ी। प्रवासी मज़दूरों के मामलों में कंधे से कंधा मिलाकर लड़ी। उन्हें उनका हक़ दिलवाया।

हमारे जीवन और समाज को प्रतिबिबिंत करने वाले और भी बहुत सारे पात्र हैं इस धारावाहिक में, जिनकी कहानियां हमारे क़ानून-बोध में जागरूकता का संचार करती हैं।
प्रारंभ में बसंतो क़ानून में कोई भरोसा नहीं रखती थी। सत्यव्रत ने उसे न केवल क़ानून की महत्ता समझाई बल्कि उसे धीरे-धीरे इतना जागरूक कर दिया कि वह दूसरों को भी क़ानून की शिक्षा दे सके।

धारावाहिक की पहली कड़ी में सत्यव्रत बने हुए अशोक चक्रधर बंसतो बनी हुई अमिता उद्गाता को कभी समझाते हुए, कभी गाकर बताते हुए नज़र आते हैं। दूसरी कड़ी में शादी से जुड़े सवाल हैं। तीसरी कड़ी में दहेज की समस्या के अत्यंत मार्मिक दृश्यों के साथ क़ानूनों की जानकारी दी है। पति-पत्नी के संबंधयदि ठीक होने असंभव लगें तो क़ानून में तलाक की व्यवस्था है। यह बात बताती है चौथी कड़ी। पांचवीं कड़ी में सम्पत्ति से जुड़े महिला अधिकारों का वर्णन है। यह ऐपीसोड तकनीकी दृष्टि से बहुत अच्छा बन पड़ा है। पूरी कहानी फ्लैश-बैक में चलती है।

बलात्कार जैसे संवेदनशील विषय को अशोक जी ने बहुत शालीनता से प्रस्तुत किया है। बंबइया फ़िल्में जहां ऐसे विषयों को कु त्सित ठंग से भुनाती हैं, वहां यह फ़िल्म इस सामाजिक बुराई के प्रति जनमन को जागरूक करती है।

आगामी कड़ियां पुलिस एवं मज़दूरों और श्रम क़ ानूनों के बारे में है। सभी कड़ियों में कथातत्व का निर्वाह बड़े कौशल से हुआ है।

कलाकारों में प्रमुख हैं- अशोक चक्रधर, अमिता उद्गाता, मुनीषा राजपाल, माधवेन्द्र, जयश्री सेठी, बी.के.सूद, ब्रज नुक्ता, अरूण शर्मा, सुभाष त्यागी।

तकनीकी दृष्टि से हर एपिसोड उच्चस्तरीय है। सहनिर्देशक अरविन्द बब्बल ने निर्देशन के तकनीकी पक्षों को कुशलतापूर्वक निभाया, डॉ. मुकेश गर्ग के संगीत निर्देशन में डॉ. उमा गर्ग द्वारा गाए गए गीत मन पर गहरा प्रभाव छोड़ते हैं।

यों तो यह धारावाहिक दूरदर्शन पर प्रसारित हो चुका है लेकिन भारतवर्ष की कमजोर, कमेरी और कामकाजी महिलाओं में जागरूकता लाने के लिए इसका बहुविधउपयोग होना चाहिए। स्वयंसेवी संस्थाओं को आगे बढ़कर इस धारावाहिक का शैक्षिक इस्तेमाल करना चाहिए।