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भोर-तरंग

धारावाहिक / लेखन-निर्देशन

अब से लगभग पंद्रह साल पहले प्रातः कालीन प्रसारण के लिए पांच-पांच मिनट के पंद्रह ‘भोर तरंग’ कार्यक्रम अशोक जी ने बनाए थे, जिन्हें दूरदर्शन अभी तक फ़िलर्स के तौर पर इस्तेमाल करता आ रहा है। भोर होते ही इंसान अपने जीवनयापन की विविध गतिविधियों की शुरुआत करता है। रात का सन्नाटा टूट जाता है और टूटकर तरह-तरह की ध्वनियों का झरना बनकर बिखरने लगता है। भोर की बेला में पूरे देश में संगीत के गायन-वादन की अलग रीतियां और परंपराएं मिलती हैं। अशोक जी ने देश के प्रमुख पंद्रह स्थानों की संगीतमयी भोर को कै मरे की आंख से क़ै द किया और अपनी कवितामयी कॉमैण्ट्री से उसे सुदर्शनीय के साथ-साथ सुश्रवणीय बना दिया। मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा के अनेक ऐसे स्थानों पर वे गए, जहां लोकसंगीत लोगों के हृदयों में बसता है।

स्वर्गीय शरद जोशी ने संयोग से इसकी एक-दो कड़ियां जब दूरदर्शन पर देखीं तो वे बाक़ी कड़ियां देखने के लिए सीधे स्टूडियो पहुंच गए। उनका कहना था कि ऐसे कार्यक्रम पहले अंग्रेज़ी में सोचे जाते हैं किंतु ‘भोर तरंग’ की ताक़त हिंदी और उसकी काव्यानुकूलता की ताक़त है।

‘भोर तरंग’ देखने के बाद कविता, संगीत और फ़िल्म इन तीनों की शक्तियों के अद्भुत मिलन का सघन अहसास होता है। इस कार्यक्रम को पंद्रह तक ही सीमित होकर नहीं रह जाना चाहिए था। राष्ट्रीय एकता में संगीत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।