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छोटी सी आशा

क्या किसी ने अशोक चक्रधर को रोते देखा है? और रोना भी ऐसा कि आंसू निकले भी और नहीं भी, पर दुनिया के अनेक कोनों में टेलीविज़न के सामने बैठे लाखों लोग अपने आंसू न रोक पाए। ये पहलू बहुआयामी व्यक्तित्व से संपन्न चक्रधर का अब तक छिपा एक नायाब पहलू है। चक्रधर रोते हुओं को हंसाने के लिए विख्यात रहे हैं परंतु कवि चक्रधर के अंदर छिपे एक सशक्त अभिनेता ने ‘छोटी सी आशा’ धारावाहिक में अपनी अनूठी भूमिका के ज़रिए दर्शकवर्ग के मानस-पटल पर एक और छवि सफलता के साथ चित्रित की।

धारावाहिक के निर्माण की रूपरेखा तय करते समय सभी पात्रों के लिए उपयुक्त कलाकार आसानी से मिल गए परंतु एक पात्र ऐसा था, जिसने निर्माता-निर्देशन के सामने चुनौती खड़ी कर दी। पात्र एक रिटायर्ड हिंदी अध्यापक है, जिसे अपनी भाषा के प्रति श्रद्धा के साथ-साथ अभिमान भी है, वह एक कवि है, जिसके लिए कविता उसकी हर भावनात्मक अवस्था की अभिव्यक्ति है, एक हथियार है।

वह सामाजिक विडंबनाओं पर अपनी कविताओं के ज़रिए चोट करता है। स्वभाव से सरल और हंसने-हंसाने वाला है। कथा के आरंभ में यह पात्र नायक का मित्र, गुरु और मार्गदर्शक है। नायक इसका छात्र था, पर आज एक सफल उद्योगपति हो जाने के बावजूद गुरु के प्रति वही श्रद्धा रखे हुए है, उनसे उपलब्धियों, पीड़ाओं और विडंबनाओं में मार्गदर्शन लेता है। कथा के उत्तरार्ध में एक मोड़ आता है-

कवि का इकलौता बेटा भारतीय थलसेना में कैप्टन है। वह सोमालिया में युद्घरत शांतिसेना का अंग है और वहीं मारा जाता है। कवि अपनी भोली पत्नी के विषय में सोचकर खुद को संभालता है। यहां से अभिनय अत्यधिक चुनौतीपूर्ण हो जाता है। कवि दोहरी ज़िंदगी जीता है। बेटे का कोई समाचार न पाकर जब भी पत्नी व्यथित होती है, उसे हास्य कविताएं (जो ऊपर से हास्य लगती हैं परंतु मूलतः मार्मिक अर्थ छिपाए हैं) सुनाकर हंसाता है और अके ले में एक टूटा हुआ बाप खुद के आंसुओं से जूझता है।

सालभर तक वह यह नाटक सफ लतापूर्वक निभाता रहा परंतु एक दिन उसकी अनुपस्थिति में सेना वाले आकर बेटे का सामान उसकी पत्नी को सौंपते हैं और पत्नी पुत्र की मृत्यु जानकर पाषाणवत्‌ हो जाती है। वह तो शांति सेना की वापसी का समाचार सुनकर पूरे उल्लास के साथ घर को सजाकर बेटे की प्रतीक्षा कर रही थी। सदमा उसे विचारशून्य काठ-सा कर देता है। कालांतर में एक सुखद झोंका आता है, कवि का मद्रासी शिष्य विवाह कर अपनी पत्नी के साथ उनका आशीर्वाद लेने आता है। कवि की पत्नी, जो बेटे को दूल्हे के रूप में देखने के लिए वर्षों से लालायित थी, रुग्णावस्था में श्रीनिवास को अपना बेटा समझकर उठ बैठती है। पत्नी की लंबी ख़ामोशी टूटने से कवि को राहत मिलती है और वह पत्नी के भ्रम को कायम रखते हुए श्रीनिवास को ही पुत्र स्वीकार कर लेता है।

क्षण-क्षण रूप बदलते इस किरदार के लिए सही कलाकार चुन पाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य था। अगर किसी एक्टर को लेते तो हर प्रसंग के लिए उपयुक्त कविता लिखने का काम कौन करता।

शूटिंग बतौर सूत्रधार चक्रधर जी के लिए कोई नई चीज़ न थी, परंतु अभिनय के दौरान सही लुक देना, एक्शन कन्टीन्यूटी का स्वयं ध्यान रखना एक नए अभिनेता के लिए कोई आसान बात नहीं होती परंतु चक्रधर जी का रंग-ढंग हमने बिलकु ल मंजे हुए प्रोफेशनल अभिनेताओं-सा पाया। हमें इस बात का कतई अहसास नहीं हुआ कि कैमरे के सामने चक्रधर जी बतौर अभिनेता पहली बार उतरे हैं। अपने सरल हंसमुख व्यक्तित्व के कारण वह अहिंदीभाषी यूनिट में भी काफ़ी लोकप्रिय हो गए थे।

अभिनय के दौरान उनके सामने वाले पात्र के साथ तारतम्य बिलकुल पक्का  और परफैक्ट टाइमिंग के साथ होता था, चाहे वह हर्षछाया-सा मंजा हुआ अभिनेता हो या कोई जूनियर आर्टिस्ट। कभी-कभी उनके अभिनय से लोग इतने बंध जाते थे कि हास्य- प्रसंगों पर ये भूलकर कि शूटिंग चल रही है, हंस पड़ते थे, जिसका खामियाज़ा चक्रधर जी को भुगतना पड़ता था। क्योंकि लाइव साउण्ड होने के कारण हंसना टेक को बिगाड़ देता था और चक्रधर जी को पुनः वह टेक देना पड़ता था।

जब मार्मिक दृश्य अभिनीत होते तो यूनिट में अक्सर किसी-न-किसी को आंखें पोंछनी ही पड़ जाती थीं। ‘छोटी सी आशा’ धारावाहिक में उनके कवि एवं अभिनेता रूप का शानदार समन्वय है। 

छोटी सी आशा

 


क्या किसी ने अशोक चक्रधर को रोते देखा है? और रोना भी ऐसा कि आंसू निकले भी और नहीं भी, पर दुनिया के अनेक कोनों में टेलीविज़न के सामने बैठे लाखों लोग अपने आंसू न रोक पाए। ये पहलू बहुआयामी व्यक्तित्व से संपन्न चक्रधर का अब तक छिपा एक नायाब पहलू है। चक्रधर रोते हुओं को हंसाने के लिए विख्यात रहे हैं परंतु कवि चक्रधर के अंदर छिपे एक सशक्त अभिनेता नेछोटी सी आशाधारावाहिक में अपनी अनूठी भूमिका के ज़रिए दर्शकवर्ग के मानस-पटल पर एक और छवि सफलता के साथ चित्रित की।

धारावाहिक के निर्माण की रूपरेखा तय करते समय सभी पात्रों के लिए उपयुक्त कलाकार आसानी से मिल गए परंतु एक पात्र ऐसा था, जिसने निर्माता-निर्देशन के सामने चुनौती खड़ी कर दी। पात्र एक रिटायर्ड हिंदी अध्यापक है, जिसे अपनी भाषा के प्रति श्रद्धा के साथ-साथ अभिमान भी है, वह एक कवि है, जिसके लिए कविता उसकी हर भावनात्मक अवस्था की अभिव्यक्ति है, एक हथियार है।

वह सामाजिक विडंबनाओं पर अपनी कविताओं के ज़रिए चोट करता है। स्वभाव से सरल और हंसने-हंसाने वाला है। कथा के आरंभ में यह पात्र नायक का मित्र, गुरु और मार्गदर्शक है। नायक इसका छात्र था, पर आज एक सफल उद्योगपति हो जाने के बावजूद गुरु के प्रति वही श्रद्धा रखे हुए है, उनसे उपलब्धियों, पीड़ाओं और विडंबनाओं में मार्गदर्शन लेता है। कथा के उत्तरार्ध में एक मोड़ आता है-

कवि का इकलौता बेटा भारतीय थलसेना में कैप्टन है। वह सोमालिया में युद्घरत शांतिसेना का अंग है और वहीं मारा जाता है। कवि अपनी भोली पत्नी के विषय में सोचकर खुद को संभालता है। यहां से अभिनय अत्यधिक चुनौतीपूर्ण हो जाता है। कवि दोहरी ज़िंदगी जीता है। बेटे का कोई समाचार न पाकर जब भी पत्नी व्यथित होती है, उसे हास्य कविताएं (जो ऊपर से हास्य लगती हैं परंतु मूलतः मार्मिक अर्थ छिपाए हैं) सुनाकर हंसाता है और अके ले में एक टूटा हुआ बाप खुद के आंसुओं से जूझता है।

सालभर तक वह यह नाटक सफ लतापूर्वक निभाता रहा परंतु एक दिन उसकी अनुपस्थिति में सेना वाले आकर बेटे का सामान उसकी पत्नी को सौंपते हैं और पत्नी पुत्र की मृत्यु जानकर पाषाणवत्‌ हो जाती है। वह तो शांति सेना की वापसी का समाचार सुनकर पूरे उल्लास के साथ घर को सजाकर बेटे की प्रतीक्षा कर रही थी। सदमा उसे विचारशून्य काठ-सा कर देता है। कालांतर में एक सुखद झोंका आता है, कवि का मद्रासी शिष्य विवाह कर अपनी पत्नी के साथ उनका आशीर्वाद लेने आता है। कवि की पत्नी, जो बेटे को दूल्हे के रूप में देखने के लिए वर्षों से लालायित थी, रुग्णावस्था में श्रीनिवास को अपना बेटा समझकर उठ बैठती है। पत्नी की लंबी ख़ामोशी टूटने से कवि को राहत मिलती है और वह पत्नी के भ्रम को कायम रखते हुए श्रीनिवास को ही पुत्र स्वीकार कर लेता है।

क्षण-क्षण रूप बदलते इस किरदार के लिए सही कलाकार चुन पाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य था। अगर किसी एक्टर को लेते तो हर प्रसंग के लिए उपयुक्त कविता लिखने का काम कौन करता।

शूटिंग बतौर सूत्रधार चक्रधर जी के लिए कोई नई चीज़ न थी, परंतु अभिनय के दौरान सही लुक देना, एक्शन कन्टीन्यूटी का स्वयं ध्यान रखना एक नए अभिनेता के लिए कोई आसान बात नहीं होती परंतु चक्रधर जी का रंग-ढंग हमने बिलकु ल मंजे हुए प्रोफेशनल अभिनेताओं-सा पाया। हमें इस बात का कतई अहसास नहीं हुआ कि कैमरे के सामने चक्रधर जी बतौर अभिनेता पहली बार उतरे हैं। अपने सरल हंसमुख व्यक्तित्व के कारण वह अहिंदीभाषी यूनिट में भी काफ़ी लोकप्रिय हो गए थे।

अभिनय के दौरान उनके सामने वाले पात्र के साथ तारतम्य बिलकुल पक्का  और परफैक्ट टाइमिंग के साथ होता था, चाहे वह हर्षछाया-सा मंजा हुआ अभिनेता हो या कोई जूनियर आर्टिस्ट। कभी-कभी उनके अभिनय से लोग इतने बंध जाते थे कि हास्य- प्रसंगों पर ये भूलकर कि शूटिंग चल रही है, हंस पड़ते थे, जिसका खामियाज़ा चक्रधर जी को भुगतना पड़ता था। क्योंकि लाइव साउण्ड होने के कारण हंसना टेक को बिगाड़ देता था और चक्रधर जी को पुनः वह टेक देना पड़ता था।

जब मार्मिक दृश्य अभिनीत होते तो यूनिट में अक्सर किसी-न-किसी को आंखें पोंछनी ही पड़ जाती थीं।छोटी सी आशाधारावाहिक में उनके कवि एवं अभिनेता रूप का शानदार समन्वय है।