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भारत महोत्सव

अशोक चक्रधर से मेरा परिचय मास्को में हुआ। मैं वहां ‘अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म समारोह’ में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहा था और अशोक जी दूरदर्शन की ओर से ‘भारत महोत्सव’ का आंखों-देखा हाल सुनाने तथा वहां की अन्य गतिविधियों की कवरेज करने के लिए गए थे। समारोह का आंखों- देखा हाल सुनाते समय अशोक जी की शैली अत्यंत काव्यात्मक थी। बस, तभी से मैं इनका प्रशंसक बन गया।

इनकी रचनाओं में हास्य-व्यंग्य के माध्यम से समाज का दर्द कू ट-कू ट कर भरा है तथा आधुनिक सामाजिक बुराइयों पर तीखा कटाक्ष है। जटिल विषय-वस्तु के बावजूद इनकी रचनाएं इतनी सरल होती हैं कि सुननेवाले पर तत्काल प्रभाव डालती हैं। वह असल मायने में जनता के कवि हैं, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति कविता को आसानी से समझ लेता है और उसका भरपूर आनंद उठाता है। इनकी शैली मन को अंदर तक छू लेनेवाली है।

भारत में ‘अपना उत्सव’ के सफल संचालन के बाद अशोक चक्रधर को दूरदर्शन की ओर से ‘भारत महोत्सव’ का आंखों देखा हाल सुनाने के लिए सोवियत संघ भेजा। भारत महोत्सव की विविध गतिविधियों एवं मुख्य समारोह का आंखों देखा हाल सुनाते समय अशोक जी की शैली अत्यंत सरल लेकिन काव्यात्मक थी।

लोककलाओं के बारे में गहन जानकारी होने के कारण वे जो कुछ भी बोलते थे, अधिकार के साथ बोलते थे। उनकी वाणी में जहां एक ओर अपने देश की सांस्कृतिक विरासत के बखान के लिए अलंकारपूर्ण वाक्यविन्यास थे तो दूसरी ओर अपने देश के कलाकारों के लिए सहज भाषा में भावनात्मक अभिव्यक्ति थी।

हिन्दी के उनके उद्घोषक श्री विनोद दुआ राजनीतिक परिदृश्य पर बोलते थे और अशोक जी अपने देश की सांस्कृतिक विरासत पर। दोनों ने एक वाचिक सामंजस्य के साथ ‘भारत महोत्सव’ के आंखों देखे हाल को अविस्मरणीय बना दिया।

सिद्घेश्वर दयाल