पुस्तकें

पटकथा

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जब रहा न कोई चारा

पुस्तक के बारे में कहा गया है कि यह मीडिया नाट्य संकलन है। ऐसा लगता है जैसे अशोक चक्रधर मीडिया नाटक जैसी किसी नई विधा से रूबरू कराने जा रहे हैं। वस्तुतः मीडिया नाटक के रूप में इस संकलन में जहां एक ओर ‘बात पते की’, ‘समझ गया सांवरिया’ और ‘अंगूरी’ जैसे रेडियो नाटक हैं, वहीं दूसरी ओर टी.वी. के लिए बनाई गई छोटी-छोटी हास्य झलकियां हैं, तो तीसरी ओर कुछ टेली-प्ले भी हैं।..


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बिटिया की सिसकी

कम उम्र में ही कन्या का विवाह कर देना, हमारे देश की एक बड़ी समस्या है। इसके बहुत सारे घातक परिणाम समाज में दिखाई पड़ते हैं। समय की मांग है कि सभी मिलकर इस कुरीति को दूर करने का संकल्प लें।…


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