पुस्तकें

तमाशा

काव्य संकलन

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‘तमाशा’ दस लंबी-लंबी कविताओं का संकलन है। कविताएं हास्य-व्यंग्य से भरपूर हैं। कविता-संकलन में ‘तमाशा’ शीर्षक से एक कविता भी है। अनुक्रम से पूर्व आमुख के स्थान पर इसी कविता की हृदयस्पर्शी पंक्तियां उद्घृत की गई हैं। संकलित कविताओं में हास्य-रेखाओं के सहारे आज के युग की विडंबनापूर्ण स्थिति को उभारा गया है। सामाजिक यथार्थ की प्रवंचनापूर्ण तस्वीर का दर्शाया गया है। या यों कहिए कि आधुनिक मानव के फ रेबी हृदय का पर्दाफाश किया गया है। इन कविताओं में कवि के अंतस्‌ की पीड़ा विद्यमान है।

अशोक चक्रधर जनकवि हैं तथा उनका स्वर ‘लोकवाणी’ का पर्याय है। पुस्तक में बीच-बीच में सुधीर तैलंग के व्यंग्य-चित्र कविता के मार्मिक प्रसंगों की भावभूमि को इस प्रकार संस्पर्शित करते हैं कि संपूर्ण दृश्य अनोखे रूप से मूर्तिमान हो उठता है। वर्तमान युग के क्षितिज पर ‘ग़रीबी की रेखा’ को शब्दों की छैनी से तराशते हैं।

कविता-संकलन में भावबिंबों को उभारने के लिए जिन प्रतीकों को चुना गया है, वे सभी लोकव्यवहार की परिधि के अंतर्गत सर्वसाधारण द्वारा जाने-पहचाने हैं। भाषा अत्यंत सरल है। भावगांभीर्य उतना है, जितना श्रोता की वैयक्तिक पकड़ है। अभिप्राय यह है कि गांव के घसियारे से लेकर प्रबुद्घजनों की मानसिक तृप्ति के लिए मनोनुकूल भोज्य सामग्री इन कविताओं में उपलब्ध है। ‘चालीसवां राष्ट्रीय भ्रष्टाचार महोत्सव’ अंतिम कविता में भ्रष्टाचार जूरी के मेम्बरान ने मिलकर आरती गाई है, जो कवि की भाषा और शैली पर अप्रतिम पकड़ का प्रत्यक्ष साक्ष्य है।

अनुक्रम

  • गरीबदास का शून्य
  • बधाई
  • दुनिया पागलख़ाना
  • तमाशा
  • साजिश का धुआं
  • कुयोग श्रृंगार

  • सपनों के राजकुमारों के लिए
  • हास्य कवि नगर
  • रामायण देखते चेहरे
  • चालीसवां राष्ट्रीय भ्रष्टाचार महोत्सव