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सब मिलती रहना

काव्य संकलन

सब मिलती रहना

बलिहारी नायलॉन पूल की! नरेंद्र जी को हां कर दी, पता नहीं सही किया या भूल की। हुआ यों कि सन दो हज़ार दो में डायमंड बुक्स के स्वामी नरेन्द्र कुमार जी के साथ एक अंतरराष्ट्रीय हिन्दी संगोष्ठी के लिए त्रिनिदाद जाना हुआ था। प्रेम जनमेजय ने बड़े प्रेम से बुलाया था। अपनी टिकिट नरेन्द्र जी के साथ ही थी। एयरपोर्ट पर उनके साथ टहले, सीढ़ियों पर उनके साथ चढ़े-उतरे। बाज़ारबाज़ी करी। हवाख़ोरी और थोड़ा सा योगाभ्यास। इन सबके बीच पावरपॉइंट प्रेज़ेंटेशन बनाते रहे, बतियाते रहे। उन्होंने अचानक प्रस्ताव रखा कि मैं उनकी पत्रिका गृहलक्ष्मी के लिए कुछ लिखूं। मैं मुस्कुरा दिया। एक ऐसी पत्रिका जो फैशन, भोजन-भजन, स्वेटर की बुनाई और सिलाई, चेहरे के रंग-रोगन और वस्त्राभूषण पर आधारित हो, उसमें चक्रधर क्या करेगा। वे बोले देश की नारियों को अपने व्यंग्य के ज़रिए ज्ञान की बात बताइए। सोचिए-सोचिए। मैंने कहा— सोचता हूं, सोचता हूं।
त्रिनिदाद से जब टोबैगो गए और वहां के नायलॉन पूल में नहाए, तब सोच-प्रक्रिया सम्पन्न हुई। आप सोचते होंगे कि नायलॉन पूल कोई स्वीमिंग पूल होगा। ऐसा नहीं है। समन्दर के अन्दर, दूर जाकर कहीं एक छोटा-सा टुकड़ा है, जो स्वीमिंग पूल जैसा है। वहां पानी भी स्थिर और निर्मल है। कहते हैं कि नायलॉन पूल में डुबकी लगा लो तो उम्र दस वर्ष कम हो जाती है। हमारे साथ जितने विद्वान मित्र थे सभी ने डुबकी लगाई और वाकई पानी ने असर दिखाया। सबको अपनी-अपनी पत्नियां, पत्नियों को उनके पति, अच्छे लगने लगे। नरेंद्र जी और मैं अकेले थे, मुझे उनका प्रस्ताव अच्छा लगने लगा। मैंने कहा नरेंन्द्र जी मैं ज़रूर लिखूंगा लेकिन इतना जानता हूं कि जो शख़्स नारियों को ज्ञान देने की कोशिश करता है उसका भविष्य अच्छा नहीं देखा गया। नारी के आगे विद्वान नहीं, अनाड़ी बने रहो तो सुखी बने रहोगे। नरेन्द्र जी बोले— क्यों न आप ऐसा ही करने लगें कि नारी आपसे सवाल पूछें और आप उनका जवाब अनाड़ी बनकर दें, कविता में। मैंने तत्काल कहा— मंज़ूर! और नायलॉन पूल से निकलते ही डील डन हो गई।
दो हज़ार तीन से शुरू हुआ सिलसिला अब तक जारी है। पत्रिका के अंतिम पृष्ठ पर ‘नारी के सवाल, अनाड़ी के जवाब’ नाम का स्तम्भ चल निकला। पहली बार तो अड़ौसियों-पड़ौसियों से प्रश्न पुछवाए गए, फिर दनादन पत्र आने लगे और मैं भी कभी गुदगुदाते हुए, कभी समझाते हुए, कभी सहलाते हुए, कभी मरहम लगाते हुए, यूं ही, अनगढ़ से उत्तर देने लगा। वर्ष-दर-वर्ष बीते। प्रश्न-दर-प्रश्न आते रहे, उत्तर-दर-उत्तर जाते रहे और इस तरह बनी किताब। पृष्ठ ज़्यादा हो गए तो सोचा इनको दो भागों में बांट दिया जाए। ये राम कहानी है ‘सब मिलती रहना’ की। दूसरी किताब जो आप देखेंगे, उसका नाम रखा है ‘डाल पर खिली तितली’।