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डाल पर खिली तितली

काव्य संकलन

डाल पर खिली तितली 1

मानव जगत में ऐसा कहां होता है कि तितली फूल पर मंडराए। यहां तो क़िस्म-क़िस्म के फ़ूल क़िस्म के फूल ही तितली पर मंडराते दिखाई देते हैं। ज़माना धीरे-धीरे बदल भी रहा है, इसलिए जिसका दांव लगता है, वही मंडराने लगता है। देखा जाए तो इसमें बुरा भी क्या है। मैं अक्सर कहता हूं कि ये दोनों रचना हैं चराचर की, ताक़त हैं बराबर की।
किसने कह दिया कि मंडराना बुरा है? जब भी मन करे मंडराओ! क्यों किसी से घबराओ। मंडराने के भी कुछ सिद्धांत होते हैं। मन से मंडराया जाना चाहिए, तन और धन से नहीं। ‘गृहलक्ष्मी’ पत्रिका में ‘नारी के सवाल, अनाड़ी के जवाब’ नामक स्तम्भ में निरंतर नारियों के प्रश्न मेरे ऊपर मंडरा रहे हैं और उत्तर भी कौन से लकवाग्रस्त हैं। उड़ने को लालायित रहते हैं। कभी उड़ते हैं, कभी ऊंची उड़ाते हैं। नीची निगाह करके ऊंची छोड़ते हैं। पर चेतना यही है कि तोड़ते नहीं हैं। आपस में जोड़ते हैं।
मुझे ख़ुशी है कि यह स्तम्भ पिछले सात-आठ वर्ष से चल रहा है। इसकी निरंतरता में कोई अवरोध नहीं आया है। एक बार ऐसा हुआ कि संपादक ने इसका स्थान अंतिम पृष्ठ से बीच में कहीं कर दिया। सच्ची बताऊं मुझे अच्छा नहीं लगा। लेकिन यह मैंने संपादक से नहीं कहा। मेरे कुछ करने-कहने से पहले ही पाठिकाओं से प्रतिक्रियाएं मिलने लगीं कि नहीं-नहीं-नहीं, इसका स्थान वहीं सुरक्षित रखना चाहिए, क्योंकि हम आपकी पत्रिका को पीछे से पढ़ना प्रारम्भ करते हैं।