पुस्तकें

बूढ़े बच्चे

काव्य संकलन

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बाल वर्ष के दौरान अशोक चक्रधर कामकाजी बच्चों पर एक डाक्यूमैंट्री फिल्म बनाने के सिलसिले में अपने दोस्त सलीम के साथ पुरानी दिल्ली की गलियों में चक्कर लगाते हुए उन गलियों के नाम नोट कर रहे थे। बच्चों को इस तरह ज़िंदगी से जूझते हुए देखकर वह सिहर उठे। यथार्थ से उनका ऐसा साक्षात्कार था, जिसने शोषण का एक नया संदर्भ उनके सामने खोला था, जिसने कई तरह के प्रश्न उनके सामने लाकर खड़े कर दिए थे। फिल्म से पहले कविता बन गई। बक़ौल अशोक चक्रधर के यह कविता फिल्म-योजना की बाईप्रोडक्ट है। अपनी इस रचना की प्रक्रिया को बताते हुए कहते हैं-
‘एक सर्वे में पाया गया कि भारत में सबसे ज़्यादा समझदार बच्चे जामा मस्जिद, पुरानी दिल्ली की तंग गलियों में रहते हैं। जानकर हैरानी-सी होती है कि जिस इलाक़े में न शिक्षा का उचित प्रबंध है, न बेहतर जीवनस्तर, वहां यह कैसे संभव है, इन बच्चों के बारे में कहावत है कि ये पैदा होते ही गलियों में निकल आते हैं। तंग गलियों की गतिमय ज़िंदगी इनके लिए स्कूल का काम करती है और तरह-तरह के पेशे में लगे हुए ये बच्चे इतने अनुभवी हो जाते हैं कि अन्य बच्चे नहीं हो पाते। एक दूसरी बात- बच्चों के एक प्रकाशक मित्र का व्यावसायिक नारा है- ‘हमारी किताबें आठ साल से अस्सी साल तक के बच्चों के लिए हैं।’ उन प्रकाशक मित्र से मैंने यों ही कहा- ‘बंधुवर, हमारे देश में यदि अस्सी साल के बच्चे हैं तो आठ साल के बूढ़े भी हैं।’बूढ़े बच्चे’ कविता की शुरुआत यहीं से हुई।’ वे कहते हैं जब मैंने अपने नोट्स को देखा, गलियों के नाम पढ़े तो महसूस हुआ कि यह तो अपने-आपमें कविता की पंक्तियां हैं-
गलियों से गले मिलती गलियां हैं / गलियां ही गलियां हैं / गलियां दर गलियां हैं, गलियों में महकती हुई / पूरी एक दुनिया है। गली हाफ़िज़ बन्ने वाली / गली हकीमजी की / गली सुर्ख़पोशां वाली / गली पीरमुर्गे वाली / गली मीर कासिमजान। इसी गली का हाथ थामे दूजी गली / चली गई, उस गली से गले मिली / उस गली ने इस गली के पैर छुए / इस गली ने उस गली के कान पकड़े / तीसरी गली ने चौथी गली के सिर पर हाथ फेरा। / पांचवीं ने पहली का फूला हुआ पेट ही टटोल लिया।
‘बूढ़े बच्चे’ कविता के आरंभ में जो परिवेश का बयान है, वह लाजवाब है। सादा मगर प्रभावी, मगर यह प्रभाव आपको प्रभावी तभी लगेगा, जब आप इस इलाक़े में ज़्यादा न सही, थोड़े बहुत घूमे-फिरे हों। कामकाजी बच्चों का भविष्य राष्ट्रीय स्तर की समस्याओं में से एक समस्या है, जिसकी तरफ बहुत देर से ही सही, मगर ध्यान दिया गया है। उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, नौकरी, सुरक्षा का प्रबंध वैसा नहीं हो पाया है, जैसा कि होना चाहिए। अशोक चक्रधर की यह कविता समय से पहले बयान किया यथार्थ भी है और अपने समय का सच भी है, जो ख़ूब बांचा गया।

–श्रीमती नासिरा शर्मा द्वारा की गई पुस्तक-समीक्षा का अंश