पुस्तकें

किस-किस की जय हो

काव्यानुवाद

कविता और स्वत:स्फूर्त सहजता साथ-साथ चलती हैं। कई बार कविता की प्रेरणा के पीछे चिंतन होता है। इस संग्रह में दोनों तरह की कविताएं शामिल हैं। मेरी सहज कविताएं उन ख़ास पलों से उभरी हैं जो मेरे मन को गहराई तक छू गए। कुछ कविताओं में मैंने विचारों को शब्दों में ढालने का निर्णय लिया। परिणामस्वरूप, पिछले चार सालों में कविताओं का एक सिलसिला चल निकला। इस संग्रह की कुछ कविताएं बिल्कुल नई हैं और कुछ इससे पहले ‘आई विटनेस’ नामक संकलन में छप चुकी हैं।

हिन्दी में लिखी गई मेरी एकमात्र कविता है, ‘किस-किस की जय हो’। इसके पीछे भी एक कहानी है। दो हज़ार नौ में जिन दिनों गुलज़ार को उनके गीत ‘जय हो’ के लिए ऑस्कर से नवाज़ा जा रहा था, उसी दौरान उन्होंने ‘आई विटनेस’ के लोकार्पण में अध्यक्षता करने के लिए आना स्वीकार किया। तब मेरा ध्यान भारत के उन वास्तविक नायकों की ओर गया, जिनकी दृढ़ता की बदौलत, भारत साठ सालों से निरंतर आगे बढ़ता रहा है और उन्हें कोई जानता तक नहीं। वास्तविक ‘जय हो’ तो उन्हीं की होनी चाहिए।

अशोक चक्रधर की हिन्दी कविताएं मुझे बहुत अरसे से अच्छी लगती रही हैं। एक दिन बातचीत के दौरान मैंने ‘किस-किस की जय हो’ सुनाई। उन्हें यह कविता पसंद आई। जब मैंने ‘आई विटनेस’ की कुछ अंग्रेज़ी कविताओं का पाठ किया, तो उन्होंने उनमें से कुछ के हिन्दी अनुवाद का प्रस्ताव रखा। मुझे अच्छा लगा। अशोक चक्रधर की कविता में सम्मोहन है, हास्य है, संप्रेषणीयता है, भावनाओं को झकझोरने वाली एक ताकत है और लयात्मकता है। जो संशय मेरे मन में था वह मैंने उन्हें बता भी दिया कि कहीं अनुवाद की प्रक्रिया में कविताओं की लयात्मकता छूट न जाए। काम मुश्किल था। मुझे लगा कि मूल भाव को संरक्षित रखते हुए यदि लयात्मकता भी चाहिए तो भाषा और छंद के मामले में अशोक को कुछ छूट देनी ही पड़ेगी। और ऐसा ही हुआ। कुछ अनुवाद तो वाकई मूल से भी अच्छे बन पड़े हैं। कहीं-कहीं उन्होंने थोड़ी ज़्यादा काव्यात्मक छूट ले ली है। कुल मिला कर यह संकलन मेरे मनोजगत में अंकित छवियों का एक समृद्ध गुलदस्ता है।

—कपिल सिब्बल