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बंदरिया चली ससुराल

नाटक

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निर्देशक श्री राकेश शर्मा चाहते थे कि वे बच्चों के साथ एक कार्यशाला आयोजित करें और जो नाटक खेला जाए उसे अशोक चक्रधर लिखें। कार्यशाला प्रारंभ हो चुकी थी और नाटक हाथ में था नहीं। अशोक जी ने अपने बाल-मनोविज्ञान और समाजार्थिक ज्ञान के आधार पर वर्तमान उपभोक्ता संस्कृति पर व्यंग्य करते हुए एक नाटक लिखा- ‘बंदरिया चली ससुराल’।

कहानी इतनी सी है कि एक बंदर अपनी पत्नी को लेने ससुराल गया। उसके साथ कुछ मित्र भी गए। विदा कराने के बाद जब वे लौट रहे थे तो शिकारी ने लालच दिखाकर बंदरिया को अपने जाल में फंसा लिया। बंदर के अनुरोध पर चूहे ने जाल काट दिया। बंदरिया मुक्त हो गई। शिक्षा ये मिली कि लालच में नहीं फंसना चाहिए।

इस नाटक में कहानी ज्यों की त्यों है, पर आज के हालात में लालच क्या है, इस बात को नए अर्थ देने का प्रयास किया गया है। बच्चे इस नाटक को खेलेंगे, उन्हें आनंद आएगा क्योंकि नाटक में जानवर चरित्र हैं। बड़ों को भी अच्छा लग सकता है क्योंकि संदेश विशेष रूप से उनके लिए ही है। इस नाटक में गीत-संगीत की भरपूर गुंजाइश रखी गई। जानवर पात्रों के ज़रिए उपभोक्तावाद पर यह नाटक बच्चों की समझ को विकसित करता है। इसके अनेक प्रदर्शन हुए। सी.पी.सी. दूरदर्शन केन्द्र ने इस नाटक पर फ़िल्म भी बनाई।

नाटक के पात्र

जानवर पात्र

बल्लू बन्दर
हल्लम हाथी
हसीना हिरनी
बिजली बंदरिया
करंटी बंदरिया
(बिजली की सखी)
गंगादीन चूहा

बिजली की वानरी सखियां

मनुष्य पात्र

शिकारी
दूल्हा
दुल्हन
ननदी
कुछ बाराती
दो वेटर

कोरस मंडली