पुस्तकें

नाटक

अशोक जी ने जो नाटक लिखे वे आवश्यकताओं के अनुरूप रचे गए। उनका एक बाल नाटक ‘बन्दरिया चली ससुराल’ को नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा ने मंचित किया। कई संस्थाओं ने उनकी कविताओं पर लम्बे-लम्बे नाटक तैयार किए। भ्रष्टाचार महोत्सव एक ऐसी कविता है जिसका रूपांतर उन्होंने स्वयं किया और दूसरे लोगों ने भी किया। मद्रास की एक संस्था ‘चौपाल’ ने उनके तीन कविताओं को मिलाकर एक नाटक बनाया। वस्तुत: अशोक जी की कविताओं में एक कथा सूत्र हमेशा विद्यमान रहता है, एक नाटकीय कथोपकथन की शैली में वे अपनी कविताओं को बुनते हैं। ‘रंग जमा लो’ में  उनके नाटक, रूपक, प्रहसन इत्यादि आपको देखने को मिलेंगे। और भी पुस्तकें हैं, देखिए और प्रतिक्रिया दीजिए।



रंग जमा लो

प्रस्तुत पुस्तक में दस नाटकनुमा कविताएं तथा कवितानुमा नाटक लिखने का एक सफ ल प्रयोग है। ‘रंग जमा लो’ ऐसे एक बहुरंगी फूलों का गुलदस्ता है। अशोक चक्रधर ने अपनी अनोखी सूझ-बूझ तथा विषयानुकूल शिल्प से इन्हें जो रूप दिया है, वह हृदयस्पर्शी है। समस्त नाटिकाओं में काव्य की गूंजें हैं, निश्छल हास्य की फुहारें हैं, व्यंग की तीखी मार है। गीत हैं, नृत्य की थिरकन है। कहीं कठपुतली का कमाल है, तो कहीं पैरोडी की बहार है।…


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जब रहा न कोई चारा

पुस्तक के बारे में कहा गया है कि यह मीडिया नाट्य संकलन है। ऐसा लगता है जैसे अशोक चक्रधर मीडिया नाटक जैसी किसी नई विधा से रूबरू कराने जा रहे हैं। वस्तुतः मीडिया नाटक के रूप में इस संकलन में जहां एक ओर ‘बात पते की’, ‘समझ गया सांवरिया’ और ‘अंगूरी’ जैसे रेडियो नाटक हैं, वहीं दूसरी ओर टी.वी. के लिए बनाई गई छोटी-छोटी हास्य झलकियां हैं, तो तीसरी ओर कुछ टेली-प्ले भी हैं।…


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बिटिया की सिसकी

कम उम्र में ही कन्या का विवाह कर देना, हमारे देश की एक बड़ी समस्या है। इसके बहुत सारे घातक परिणाम समाज में दिखाई पड़ते हैं। समय की मांग है कि सभी मिलकर इस कुरीति को दूर करने का संकल्प लें।…


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बंदरिया चली ससुराल

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निर्देशक श्री राकेश शर्मा चाहते थे कि वे बच्चों के साथ एक कार्यशाला आयोजित करें और जो नाटक खेला जाए उसे अशोक चक्रधर लिखें। कार्यशाला प्रारंभ हो चुकी थी और नाटक हाथ में था नहीं। अशोक जी ने अपने बाल-मनोविज्ञान और समाजार्थिक ज्ञान के आधार पर वर्तमान उपभोक्ता संस्कृति पर व्यंग्य करते हुए एक नाटक लिखा- ‘बंदरिया चली ससुराल’।…


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