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मुक्तिबोध की समीक्षाई

समीक्षा

गजानन माधव मुक्तिबोध की समीक्षाई को जाने बिना समकालीन हिंदी-समीक्षा के विकास को समझना मुश्किल है। पिछले तीन-चार दशक की समीक्षा में मुक्तिबोध के समीक्षात्मक विचारों का प्रभाव असंदिग्ध माना जाता है। इस ‘समीक्षाई’ पुस्तक में मुक्तिबोध के समीक्षा-सिद्घांतों का ऐसा परिचय मिलता है, जिसे पढ़ते हुए पाठक लेखक के साथ-साथ मुक्तिबोध को नए सिरे से ‘पढ़ता’ चलता है। इस मायने में यह एक अनूठी पुस्तक है कि दुर्बोध मान लिए गए मुक्तिबोध को सबके लिए बोधगम्य बनाती है।

अशोक चक्रधर मुक्तिबोध के जानेमाने समीक्षक एवं पाठकर्ता रहे हैं। १९७५ में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘मुक्तिबोध की काव्यप्रक्रिया’ न के वल उस समय में मुक्तिबोध-संबंधी समीक्षा-ग्रंथों में एक मानक बनी बल्कि वह आज तक एक बहुपठित पुस्तक बनी हुई है। ‘मुक्तिबोध की समीक्षाई’ उस पुस्तक के सैद्घांतिक पक्ष का नया विस्तार है। नए संदर्भों में यहां एक बार फिर मुक्तिबोध के समीक्षा-सिद्घांतों को मार्क्सवादी संदर्भों तथा शीतयुद्घीय वैचारिक संघर्षों के संदर्भ में विश्लेषित किया गया है।

अपने गहरे समीक्षात्मक विवेक के आधार पर अशोक चक्रधर ने मुक्तिबोध की ‘समीक्षा’ के प्रायः जटिल सूत्रों को अपनी सहज-सुबोध शैली में ‘समीक्षाई’ बताकर पेश किया है। कोशिश रही है कि मुक्तिबोध के अनंत पाठकों के लिए मुक्तिबोध के नए अर्थ सहज ढंग से खुलें। कहने की ज़रूरत नहीं है कि अशोक चक्रधर को ‘सहज समीक्षाई’ में कमाल हासिल है। जो इस किताब को पढ़ेगा उसे इसका प्रमाण मिल जाएगा।