पुस्तकें

समीक्षा

ऐसे बहुत से रचनाकार हैं जो कवि होने के साथ समीक्षक भी रहे हों। कविता अगर एक सचेत, जागरूक कला प्रक्रिया है तो बेहतर कविता लिखने से पहले कविता की बेहतर समझ होना भी आवश्यक होता है। समीक्षा से कविता जन्म नहीं लेती है, समीक्षा कविता के पीछे-पीछे चलती है। लेकिन फिर भी कविता के प्रतिमान क्या हैं, और व्यावहारिक समीक्षा कैसी की जाती है इसका ज्वलंत उदाहरण हैं मुक्तिबोध पर लिखी हुई उनकी तीन पुस्तकें। ‘छाया की बाद’ की लम्बी भूमिका छायावाद के बाद की कविताओं की प्रमुख प्रवृतियों को रेखांकित करती है। ‘कुछ भूमि का कुछ गगन का’ में उन्होंने अनेक अनेक रचनाकारों के कृतित्त्व का व्यावहारिक मुल्यांकन किया है। लोग मानते हैं कि अशोक जी की समीक्षा में दम होता है।



छाया के बाद

छायावाद के बाद हिंदी काव्य के विकास की गतिविधि कुछ इतनी चमत्कारपूर्ण और विविधतामयी रही है कि उसे वर्षों और परिस्थितियों के तालमेल में अनुबद्घ करना असंभव-सा है। इस काल में प्रारंभ से ही बहिर्मुखी और अंतर्मुखी काव्य-चेतना का संघर्ष चलता रहा है। दोनों धाराएं अपने कथ्य के अनुकूल भाषा, छंद, काव्यरूप और सृजनशैली की उपलब्धि के लिए नवनवीन प्रयोगों द्वारा प्रयत्नशील रही हैं।…


Read More

मुक्तिबोध की काव्य-प्रक्रिया

मुक्तिबोध जो कई कारणों से जीवन में उपेक्षित रहे, मरते ही लोगों के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण हो गए। अशोक चक्रधर की किताब पहला गंभीर प्रयास है मुक्तिबोध के विश्लेषण का। डॉ. शिवकुमार मिश्र लिखते हैं, ‘आलोचनात्मक विश्लेषण में लेखक ने विषय की गहराई में प्रवेश करने की अपनी क्षमता का परिचय देते हुए उपयोगी सारांश सामने रखा है।…


Read More

मुक्तिबोध की कविताई

मुक्तिबोध की कविताओं में फ़ैंटैसी का उपयोग और उनमें निहित गहन अर्थों को साधारण समीक्षक पकड़ नहीं पाते। अशोक चक्रधर अपनी इस नई पुस्तक में मुक्तिबोध की कविताओं की रचनाप्रक्रिया और अर्थप्रक्रिया में नए ढंग से प्रवेश करते हैं और एक बार फिर सिद्घ करते हैं कि चक्रधरीय ‘पाठ’ के रास्ते मुक्तिबोध की कविताएं ‘दुरूह’ नहीं हैं, बल्कि वे सहज अर्थवान कविताएं हैं।…


Read More

मुक्तिबोध की समीक्षाई

गजानन माधव मुक्तिबोध की समीक्षाई को जाने बिना समकालीन हिंदी-समीक्षा के विकास को समझना मुश्किल है। पिछले तीन-चार दशक की समीक्षा में मुक्तिबोध के समीक्षात्मक विचारों का प्रभाव असंदिग्ध माना जाता है। इस ‘समीक्षाई’ पुस्तक में मुक्तिबोध के समीक्षा-सिद्घांतों का ऐसा परिचय मिलता है, जिसे पढ़ते हुए पाठक लेखक के साथ-साथ मुक्तिबोध को नए सिरे से ‘पढ़ता’ चलता है। …


Read More

कुछ भूमि का कुछ गगन का

क्या है कुछ भूमि का? क्या है कुछ गगन का? कवि, रचनाकार, कलाकार प्राय: गगन में रहते हैं, पर सच्चाई ये है कि बातें भूमि की ही करते हैं। उनकी कल्पनाएं किसी भी लोक में चली जाएं, लेकिन इसी लोक और लोकतंत्र के बीच की विषय-वस्तु् से जुड़ी रहती हैं। पिछले लगभग दस वर्ष में वाचिक परंपरा के बहुत सारे कवियों से सत्संग हुआ। कुछ ने चाहा कि मैं उनकी पुस्त़क की भूमिका लिखूं। तत्काचल हां तो मैंने नहीं की। निवेदन किया कि पांडुलिपि दे दीजिए, उत्साहित और प्रेरित हुआ तो ज़रूर लिख दूंगा।…


Read More