पुस्तकें

जुगत करो जीने की

प्रौढ़ एवं नवसाक्षर साहित्य

‘बोल बसंतो’ पुस्तकमाला की नवीं कड़ी है- ‘जुगत करो जीने की’। यह कड़ी ठेका प्रवासी मजदूर संबंधी क़ानूनों के बारे में जानकारी बढ़ाती है। हलकार सिंह ठेके पर गांव-गांव से प्रवासी मज़दूरों को इकट्ठा करके महानगर में लाता है और उनका शोषण करता है। लाजो और बसंतो रसोईदारिन के रूप में मज़दूरों के अड्डे पर पहुंचकर उन्हें उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने लगती हैं। हलकार सिंह ने प्रवासी मजदूरों की पास-बुक नहीं बनवाई थी। लाजो ने प्रवासी मजदूरों को समझाया कि ठेकेदार से पास-बुक की मांग करनी चाहिए। अगर ठेकेदार पास-बुक न दे तो श्रम अधिकारी से शिकायत करनी चाहिए। अगर ठेकेदार पास-बुक नहीं बनवाता है तो उसका लाइसेंस भी रद्द किया जा सकता है। बसंतो ने अपनी डलिया में छिपाकर रखी हुई एक नमूना पास-बुक मज़दूर औरतों को दिखाई। सोनपतिया ने ठेकेदार हलकार सिंह से जब पास-बुक के बारे में पूछा तो ठेकेदार बिगड़ गया। हलकार सिंह के लठैत लाजो और बसंतो को वहां से दौड़ा देते हैं। वकील सत्यव्रत बालश्रमिक और बंधुआ मज़दूरी से जुड़े क़ानून ऐनी और इरफान को बताते हैं।