पुस्तकें

बदल जाएंगी रेखा

प्रौढ़ एवं नवसाक्षर साहित्य

सारे अच्छे काम बिना किसी बाधा के पूरे हो जाएं, फिर तो कहना ही क्या है! पर ऐसा हो कहां पाता है? कभी कोई अड़ंगा मारता है, कभी कोई टांग खींचता है। कभी-कभी कोई अपने झूठे अभिमान के चक्कर में सारे काम को ही ठप्प कर देना चाहता है।

सरला और चंदर के साक्षरता अभियान में भी तरह-तरह की दिक्कतें आईं, लेकिन उन्होंने धीरज नहीं खोया। अपनी लगन में लगे रहे। पढ़ने आने वालों की समस्याओं को उन्होंने सुना और सुलझाया।

नट और नटी ने ऐसे क़िस्से-कहानियों का उपयोग करने की सलाह दी, जो निरक्षरों को पढ़ने-लिखने के लिए प्रेरित करें। जिनसे मनोरंजन भी हो और साक्षरता की ललक भी जागे।

पढ़ने वालों को केन्द्र पर जो प्रवेशिका मिली वह वर्णमाला की पुरानी पुस्तकों की तरह नहीं थी। सरला और चंदर ने अपने-अपने केन्द्र पर नई प्रवेशिका का महत्व बताया। पढ़ाई के नए तरीक़े के लाभ बताए। इस चौथे भाग- ‘बदल जाएंगी रेखा’ में पिछले सीखे हुए को दुहराया गया है और लिखना सिखाने की शुरुआत हुई है।