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पुस्तकें

प्रौढ़ एवं नवसाक्षर साहित्य

प्रौढ एवं नवसाक्षर साहित्य ऐसा क्षेत्र है जिसमें प्राय: रचनाकार, कवि, नहीं जाते हैं, उपेक्षित-सा क्षेत्र है जहां पुस्तकें तो मिलती हैं लेकिन कल्पनाशीलता और रचनाशीलता का उनमे पर्याप्त नहीं है। अशोक जी ने प्रौढ़ों के लिए जो भी लिखा मन से लिखा, देश की आवश्यकताओं को समझते हुए लिखा। और उपगोगी सिद्ध हुआ।



नई डगर

राष्ट्रीय प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम के लिए बनाई गई प्रवेशिका है। यह प्रवेशिका व्यापक साक्षरता के लक्ष्य को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। इसमें पढ़ना-लिखना सिखाने के लिए अनौपचारिक शिक्षा की नई पद्धति का इस्तेमाल किया गया है।…


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अपाहिज कौन

प्रौढ़ शिक्षा निदेशालय द्वारा प्रकाशित यह पुस्तिका खेसारी दाल के दुष्प्रभावों से किसानों को आगाह करती है। मध्य प्रदेश के सतना जिले के आसपास खेसारी दाल बहुतायत में होती है। इस फसल को उगाने में अधिक श्रम नहीं करना पड़ता।…


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हमने मुहिम चलाई

ढाई आखर होते हैं प्रेम के, ये सभी को मालूम है। शिक्षा यदि प्रेम से दी जाय और प्रेम से ली जाए तो ज्ञान के सारे रास्ते आसान हो जाते हैं।…


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भई बहुत अच्छे

‘ढाई आखर’ के पहले भाग में सरला-चंदर और नट-नटी का परिचय मिला। सरला और चंदर साक्षरता अभियान में लगे दो अध्यापक हैं। शहर से अपनी टे्रनिंग पूरी करके जब वे अपने गांव जा रहे थे तो रास्ते में नट और नटी मिले। नट और नटी थे जादुई। जब चाहे ग़ायब हो जाएं, जब चाहे प्रकट हो जाएं। उन्होंने सरला और चंदर को मदद करने का भरोसा दिया।…


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बदल जाएंगी रेखा

सारे अच्छे काम बिना किसी बाधा के पूरे हो जाएं, फिर तो कहना ही क्या है! पर ऐसा हो कहां पाता है? कभी कोई अड़ंगा मारता है, कभी कोई टांग खींचता है। कभी-कभी कोई अपने झूठे अभिमान के चक्कर में सारे काम को ही ठप्प कर देना चाहता है।…


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ताउम्र का आराम

सरला और चंदर गांव के बहुत से निरक्षरों से मिले। छुआछूत का कोई भेद नहीं। ऊंच-नीच का कोई सवाल नहीं। पुरुष केन्द्र के उद्घाटन पर सरपंच ने शुभकामनाएं दीं। पटवारी, ग्राम-सेवक और प्राइमरी स्कूल के अध्यापक भी उपस्थित हुए। महिला केन्द्र के उद्घाटन पर ख़ूब ढोलक बजी और महिलाओं ने उत्साह से भाग लिया।…


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घड़े ऊपर हंडिया

पढ़ाई-लिखाई यदि प्रेम के ढाई आखरों के सहयोग से चले तो मज़ेदार हो जाती है। पढ़ने वाले को भी आनंद आता है और पढ़ाने वाले को भी। नट ने सरला और चंदर को जो जादू का सवैया सिखाया उसे दोनों केन्द्रों पर सभी ने याद कर लिया। सवैये की मदद से कोई भी अक्षर, कोई भी मात्रा, मज़े-मज़े में ढूंढी जा सकती है।…


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तो क्या होता जी

‘बोल बसंतो’ पुस्तक माला की पहली कड़ी है- ‘तो क्या होता जी’। यह पुस्तकमाला क़ानूनी साक्षरता के उद्देश्य से नवसाक्षरों के लिए लिखी गई है। बसंतो कपड़ों के बदले बर्तन बेचने वाली एक प्रौढ़ महिला है, जो क़ानून को सिर्फ़ कोर्ट कचहरी समझती है।…


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ऐसे होती है शादी

‘बोल बसंतो’ पुस्तक माला की दूसरी कड़ी है- ‘ऐसे होती है शादी’। भारतवर्ष में शादी के अनेक कानून हैं। विभिन्न धर्मों में शादियों के अलग रीति-रिवाज हैं लेकिन कानून ने हर दृष्टि को देखते हुए मान्य और अमान्य विवाहों की व्याख्या की है।…


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रोती ये धरती देखो

‘बोल बसंतो’ पुस्तक माला की तीसरी कड़ी है- ‘रोती ये धरती देखो’। भारतीय समाज में दहेज एक बहुत बड़ा अभिशाप है। ज्योति की सास कालीदेवी अपनी बेटी सुनीता के साथ मिलकर ज्योति को बहुत सताती है।…


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कब तलक सहती रहें

‘बोल बसंतो’ पुस्तक माला की चौथी कड़ी है- ‘कब तलक सहती रहें’। भारतीय पुरुषप्रधान समाज में तलाक अभी पश्चिमी देशों की तरह आम नहीं हुआ है, लेकिन यदि अत्याचार सीमा पार कर जाएं तो हमारे क़ानूनों में तलाक का प्रावधान है।…


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अपना हक़ अपनी ज़मीन

‘बोल बसंतो’ पुस्तक माला की पांचवीं कड़ी है- ‘अपना हक़ अपनी ज़मीन’। लाजो के जीवन पर अचानक वज्रपात हुआ। उसका पति सुरेश एक सड़क दुर्घटना में मारा गया। दो छोटे-छोटे बच्चों के साथ असहाय लाजो को रिश्तेदारों ने कोई सहारा नहीं दिया।…


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कहानी जो आंखों से बही

‘बोल बसंतो’ पुस्तकमाला की छठी कड़ी है- ‘कहानी जो आंखों से बही’। यह कड़ी बलात्कार और अपहरण जैसे विषय से जुड़ी हुई है। दस बरस की बालिका को भी बलात्कार की यातना से गुज़रना पड़ा।…


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और पुलिस पर भी

‘बोल बसंतो’ पुस्तकमाला की सातवीं कड़ी है- ‘और पुलिस पर भी’। इस कड़ी में पुलिस संबंधी क़ानूनों को रेखांकित किया गया है। पुलिस जनता और क़ानूनों की हिफ़ाज़त के लिए होती है। नागरिकों को पुलिस की हर संभव मदद करनी चाहिए। रमली का पति दारू पीकर उसकी पिटाई करता था। कमाई के पैसे छीनकर ले जाता था। मजबूर रमली ने एक नौजवान का बटुआ चुरा लिया लेकिन पकड़ी गई।…


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मज़दूरी की राह

‘बोल बसंतो’ पुस्तकमाला की आठवीं कड़ी है- ‘मज़दूरी की राह’। लाजो की ज़िंदगी मुश्किल हालातों से गुज़र रही है। उसने रद्दी अख़बारों से लिफ़ाफ़े बनाने का कारोबार शुरू किया लेकिन ठेकेदार धोखेबाज़ निकले।…


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जुगत करो जीने की

‘बोल बसंतो’ पुस्तकमाला की नवीं कड़ी है- ‘जुगत करो जीने की’। यह कड़ी ठेका प्रवासी मजदूर संबंधी क़ानूनों के बारे में जानकारी बढ़ाती है। हलकार सिंह ठेके पर गांव-गांव से प्रवासी मज़दूरों को इकट्ठा करके महानगर में लाता है और उनका शोषण करता है।…


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और कितने दिन

‘बोल बसंतो’ पुस्तकमाला की दसवीं कड़ी है- ‘और कितने दिन’। यह कड़ी लाजो और बसंतो की विकास-यात्रा और क़ानूनी सहायता पर आधारित है। वकील सत्यव्रत ऐनी और इरफान को बसंतो की पूरी कहानी बताते हैं। यह एक सुखद आश्चर्य था कि क़ानून को कुछ न समझने वाली बसंतो अब क़ानून की मदद से सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध लड़ रही थी।…


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