अधन्ना सेठ

लीजिए अशोक चक्रधर ने सोचा है की अपने मित्रों और चाहकों के लिए नियमित रूप से कुछ श्रव्य सामग्री परोसी जाए। सिलसिला आज से शुरू किया जा रहा है। यहाँ रहेगी कुछ बतकही, कुछ कविताई, कुछ जीवन-जगत की समीक्षाई! विधा कोई भी हो आपको मिलेगी सुनने की सुविधा!              

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बुक सेलर, कीपर और मेकर

बुक सेलर, कीपर और मेकर   –चौं रे चम्पू! आस्ट्रेलिया के कैसे ऐं हालचाल? –चचा, आस्ट्रेलिया खुश है फिलहाल! मौसम सुहाना है। न बहुत सर्दी है, न गर्मी। रात में आकाश में चन्दा-तारे साफ़ नज़र आते हैं। दिन में चिलचिलाती धूप होती है, खिलखिलाते बच्चे, जगमगाती गाड़ियां, चमचमाती मेट्रो, दनदनाती हुई प्रगति और इन सब के बीच में कामना है कि हिन्दी हृदय की सवारी करती रहे। वैश्विक भाषा के रूप में अपनाई जाए। लोगों से मिल रहा हूं। उनकी सुनरहा हूं, अपनी सुना रहा हूं। बाकी समय में लिखाई-पढ़ाई, कुछ देखन कुछ लेखन। –अरे देखन की बता, का देखौ? –बहुत कुछ देखा, पर यहां आकर एक आदमी को मिस कर रहा हूं, नाम है उनका बॉब गूल्ड।  पिछली

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न मर जाना चुटकी में

न मर जाना चुटकी में

                न मर जाना चुटकी में (तम्बाकू सेवियों के साथ एक ज़हरीला संवाद)     सिगरट में गुण बहुत हैं सदा राखिए संग, चार यार मिल जायं तो करवाती सत्संग। करवा दे सत्संग धुंए की महिमा न्यारी, तुम्हें मिल रहे मज़े ग़ैर को है ह्त्यारी। बेकसूर भी शीघ्र मिलें तुमको मरघट में, ऐसी प्रबल पुकार भरी है इस सिगरट में।   ऐसीटिक ऐसिड मिले कैडमियम, ब्यूटेन, हैक्सामाइन, निकोटिन आर्सेनिक, मीथेन। आर्सेनिक, मीथेन कार्बन का ऑक्साइड, स्टीरिक ऐसिड, मीथेनल टोल्यूनाइड। ले अमोनिया, फूंक कलेजा जल्दी कैसी? सभी धीम्र विष धूम्र धवल सिगरट है ऐसी।   चुटकी में सुंघनी, हुलस नस्य, नास्य, नसवार, धूम्र-दंडिका, गुड़गुड़ी बीड़ी, चुरट, सिगार।

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ढूंढना पड़ेगा कहां आदरास्पद हैं

ढूंढना पड़ेगा कहां आदरास्पद हैं

                  ढूंढना पड़ेगा कहां आदरास्पद हैं (हंडिया तुम्हारी कहीं पे भी फूट सकती है)     दोस्ती का क्या है, आज है तो कल भी रहेगी, दोस्ती तो एक पल में भी टूट सकती है।   लूटने चले हो, ज़रा लौटने पे ध्यान रहे, कोई और ताकत

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कविता में चाहिए करंट

कविता में चाहिए करंट

                कविता में चाहिए करंट (कवि कभी शब्दों को छलता है कभी शब्दों द्वारा छला जाता है)     श्रीमानजी बोले— अब तुम्हारी कविताओं में नहीं है करंट, पता नहीं क्या लिखते रहते हो अंट-शंट!   मैंने कहा— रोज़ाना लिखवाओगे तो ऐसा ही होगा, पर मैंने वैसा कुछ नहीं लिखा जो स्वयं नहीं भोगा। एक ज़माना था जब हर पल हाथ में झंडा थामे सड़कों पर चलना चाहता था, न जाने कितनी छातियों पर मूंग दलना चाहता था।   आज भी मेरे ख़याल अच्छे हैं या बुरे हैं, पर मेरी चिंतन चक्की के दोनों पाट भरपूर खुरदुरे हैं। इनमें जैसा दाना डलेगा वही तो पिसेगा, वरना दिमाग़ का पाट दिल के पाट को ख़ामख़ां घिसेगा।   हम तो तुम्हारी भरी-पूरी थाली में हास्य-व्यंग्य की ज़रा सी अचारी हैं, ये भी नहीं कह सकते कि बाकी भोजन बनाने वाले भ्रष्टाचारी हैं। जो बनाते हैं भ्रष्टाचार-विरोध का भ्रष्टाचारी भोजन!

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बारह साल का सफ़रनामा

बारह साल का सफ़रनामा   –चौं रे चम्पू, पहौंच गयौ सिडनी… आस्ट्रेलिया? –हां चचा, अब तो यहां एक हफ़्ता हो गया। सिडनी की पार्लियामेंट के सभागार में हिन्दी-शिक्षण संगोष्ठी आयोजित हुई। –कैसौ रह्यौ? –चकाचक बढ़िया! इसमें अनेक हिन्दी अध्यापक थे जो शिक्षण से जुड़ी अपनी समस्याओं के साथ उपस्थित थे, बाकी यहां हिन्दी के लिए काम करने वाले बहुत सारे पुराने लोग थे। सिडनीयुनीवर्सिटी के प्रो. हाशिम दुर्रानी, हंटर्स हिल से ‘हिन्दी समाज’ की शैलजा चन्द्रा, ‘इलासा’ की रेखा राजवंशी, ‘गोपिओ’ के हरमोहन वालिया, ‘ऑस्ट्रेलिया हिन्दी कमैटी’ के अध्यक्ष तारा चन्दशर्मा, ‘ऑस्ट्रेलिया हिन्दी इंडियन एसोसिएशन’ के अध्यक्ष संतराम बजाज, ‘युनाइटेड इंडिया एसोसिएशन’ के अमरिन्दर बाजवा, ‘द इंडियन डाउन अंडर’ की नीना बधवार, भारतीय दूतावास सेहरजीत सिंह सेठी… कहां तक गिनाऊं! आयोजक

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सितार की रग और अहसास के राग

सितार की रग और अहसास के राग

                सितार की रग और अहसास के राग (बहुत पहले स्व. निखिल बनर्जी को सुनते हुए)     अहसास की रग सितार का तार हो गई। हर बार गूंज की भी गूंज की भी गूंज, कोई एक आत्मालाप छूती हुई उंगली का छूटा हुआ तार, सितार की रग या अहसास का तार?

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